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तिरी ज़ुल्फ़ों ने बल खाया तो होता | शाही शायरी
teri zulfon ne bal khaya to hota

ग़ज़ल

तिरी ज़ुल्फ़ों ने बल खाया तो होता

हैदर अली आतिश

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तिरी ज़ुल्फ़ों ने बल खाया तो होता
ज़रा सुम्बुल को लहराया तो होता

रुख़-ए-बे-दाग़ दिखलाया तो होता
गुल-ए-लाला को शरमाया तो होता

चलेगा कब्क क्या रफ़्तार तेरी
ये अंदाज़-ए-क़दम पाया तो होता

कहे जाते वो सुनते या न सुनते
ज़बाँ तक हाल-ए-दिल आया तो होता

समझता या न ऐ 'आतिश' समझता
दिल-ए-मुज़्तर को समझाया तो होता