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तेरे दर से न उठा हूँ न उठूँगा ऐ दोस्त | शाही शायरी
tere dar se na uTha hun na uThunga ai dost

ग़ज़ल

तेरे दर से न उठा हूँ न उठूँगा ऐ दोस्त

फ़ना बुलंदशहरी

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तेरे दर से न उठा हूँ न उठूँगा ऐ दोस्त
ज़िंदगी तेरे बिना ख़्वाब है अफ़्साना है

मुद्दआ इस के अलावा नहीं कुछ और मिरा
तेरा दीवाना हूँ दर पे तिरे मिट जाना है

ऐ 'फ़ना' कहते हैं मेराज-ए-इबादत उस को
मेरे हर सज्दे का हासिल दर-ए-जानाना है