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तेरा ग़म तेरी आरज़ू कब तक | शाही शायरी
tera gham teri aarzu kab tak

ग़ज़ल

तेरा ग़म तेरी आरज़ू कब तक

सुल्तान अख़्तर

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तेरा ग़म तेरी आरज़ू कब तक
मुझ से रूठा रहेगा तू कब तक

बे-ज़रूरत ये हाव-हू कब तक
वो नहीं है तो जुस्तुजू कब तक

ता-ब-कै ख़्वाहिशों की शोला-ज़नी
ये हवस की शदीद लू कब तक

कुछ रवानी की इंतिहा तो हो
यानी अर्ज़ां रहे लहू कब तक

मौसम-ए-रोज़-ओ-शब तमाम भी हो
ये तिलिस्मात-ए-रंग-ओ-बू कब तक

फूल बातों के कुछ लबों पे खिला
आँखों आँखों में गुफ़्तुगू कब तक