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शिकस्त-ए-ख़्वाब-ए-तरब-ए-ज़ा से होश-मंद हुआ | शाही शायरी
shikast-e-KHwab-e-tarb-e-za se hosh-mand hua

ग़ज़ल

शिकस्त-ए-ख़्वाब-ए-तरब-ए-ज़ा से होश-मंद हुआ

सय्यद अमीन अशरफ़

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शिकस्त-ए-ख़्वाब-ए-तरब-ए-ज़ा से होश-मंद हुआ
उठे जो हाथ तो बाब-ए-क़ुबूल बंद हुआ

गुज़र रहा है जुनूँ रेग-ए-आज़माइश से
कभी सबा कभी सरसर कभी समंद हुआ

करूँ भी क्या कि नज़र आसमाँ पे रहती है
मैं इक सितारा-ए-शब का नियाज़-मंद हुआ

अजीब शय है शफ़क़-रेज़ी-ए-तमन्ना भी
कि सैर-ए-जाँ भी हुई दर्द भी दो-चंद हुआ

नज़र भटकती रही और मैं रहा आज़ाद
नज़र जमी तो मैं शायान-ए-क़ैद-ओ-बंद हुआ

हिला न अपनी जगह से न चाक-दामन था
हवा से लड़ के मगर बर्ग-ए-अर्जुमंद हुआ

ये इफ़्तिख़ार-ए-शजर शाख़-ए-नौ-बहार से है
जो पाएमाल-ए-ख़िज़ाँ था वो सर-बुलंद हुआ

बहुत क़रीब था मुझ से मिरा हरीफ़ न था
तो क्यूँ वो साहिब-ए-दिल दरपय गज़ंद हुआ

नहीं है क़ामत-ए-बाला से कम मिरा क़द भी
वो आसमाँ है तो हो मैं भी ख़ुद-पसंद हुआ