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शम्अ' साँ शब के मेहमाँ हैं हम | शाही शायरी
shama san shab ke mehman hain hum

ग़ज़ल

शम्अ' साँ शब के मेहमाँ हैं हम

मीर हसन

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शम्अ' साँ शब के मेहमाँ हैं हम
सुब्ह होते तो फिर कहाँ हैं हम

तुम बिन ऐ रफ़्तगान-ए-मुल्क-ए-अदम
हस्ती अपनी से सरगिराँ हैं हम

बाग़बाँ टुक तो बैठने दे कहीं
आह गुम-कर्दा आशियाँ हैं हम

देखते हैं उसी को अहल-ए-नज़र
गो निहाँ है वो और अयाँ हैं हम

न किसी की सुनें न अपनी कहें
नक़्श-ए-दीवार-ए-बोस्ताँ हैं हम

जिंस-ए-आसूदगी नहीं हम पास
दर्द और ग़म के कारवाँ हैं हम

दिल से नाला निकल नहीं सकता
याँ तलक ग़म से ना-तवाँ हैं हम

क्या कहें हम 'हसन' ब-क़ौल 'ज़िया'
जिस तरह से कि अब यहाँ हैं हम

दाग़ हैं कारवान-ए-रफ़्ता के
नक़्श-ए-पा-ए-गुज़िश्तगाँ हैं हम