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शम्अ की लौ तेज़ इतनी थी धुआँ होना ही था | शाही शायरी
shama ki lau tez itni thi dhuan hona hi tha

ग़ज़ल

शम्अ की लौ तेज़ इतनी थी धुआँ होना ही था

मज़हर इमाम

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शम्अ की लौ तेज़ इतनी थी धुआँ होना ही था
फ़ाएदे के काम में कुछ तो ज़ियाँ होना ही था

किस को ख़ुश आती हमारी छत की साया-अफ़गनी
घर बनाया था तो फिर बे-ख़ानमाँ होना ही था

हम नतीजे के लिए ता-ज़िंदगी बैठे रहे
ये कहाँ समझे कि पहले इम्तिहाँ होना ही था

वादी-ए-गुल से निकलना एक मजबूरी सही
शहर-ए-ना-पुरसाँ में हम को राएगाँ होना ही था