शक्ल-ए-अक्स-ओ-आइना मस्जिद थी या मय-ख़ाना था
आप तो मेहमान था और आप साहब-ख़ाना था
किस को जुरअत थी जो करता तेरी आराइश-गिरी
सूरत-ए-शमशाद तो ख़ुद ज़ुल्फ़ था ख़ुश शाना था
हुस्न से तेरे हुआ है इश्क़ का बाज़ार गर्म
तू अगर जल्वा न करता हम को भी सौदा न था
थी सहर 'मारूफ़' शाख़-ए-सर्व-ए-गुल ख़म जा-ब-जा
हर कफ़-ए-ख़ाक-ए-चमन गोया इबादत-ख़ाना था
ग़ज़ल
शक्ल-ए-अक्स-ओ-आइना मस्जिद थी या मय-ख़ाना था
मारूफ़ देहलवी

