शहर में तन्हा था लेकिन कर्ब-ए-तन्हाई न था
घर से बाहर रह के मैं इतना तो सौदाई न था
ख़ुद-बख़ुद ही दोस्त बन कर बनते हैं दुश्मन ये लोग
वर्ना अज़-ख़ुद तो मुझे ज़ौक़-ए-शनासाई न था
तेरी नज़रों ने न जाने कितनी इज़्ज़त बख़्श दी
मुझ को पहले तो कभी भी ख़ौफ़-ए-रुस्वाई न था
इस भरी दुनिया में बस इक मैं तमाशा बन गया
और शायद कोई भी तेरा तमन्नाई न था
ग़ज़ल
शहर में तन्हा था लेकिन कर्ब-ए-तन्हाई न था
कर्रार नूरी

