शहर-ए-उल्फ़त में दिया कोई जलाते जाते
मेरे कूचे के अँधेरे भी मिटाते जाते
ये मिरा इश्क़ है कमज़ोरी नहीं है जानाँ
सर झुकाती हूँ सर-ए-राह जो आते जाते
ये जो पलकों पे सजोये हुए हैं मोती हम
ये तो दौलत है इसे कैसे लुटाते जाते
आप को दिल पे मिरे राज अगर करना था
वसवसे पहले मिरे दिल के मिटाते जाते
ज़िंदा रहने के लिए ख़्वाब ज़रूरी है बहुत
सो हमें ख़्वाब नया कोई दिखाते जाते
बे-क़रारी की ये मंज़िल नहीं होती 'ज्योति'
दूरियाँ आप अगर मुझ से बढ़ाते जाते
ग़ज़ल
शहर-ए-उल्फ़त में दिया कोई जलाते जाते
ज्योती आज़ाद खतरी

