शहर-ए-दिल फिर मिरा वीरान हुआ जाता है
घर की बर्बादी का सामान हुआ जाता है
ग़ालिबन फिर नई उफ़्ताद पड़ी है दिल पर
साँस भी नूह का तूफ़ान हुआ जाता है
तेरी हर बात से गिरता है कलेजा कट कर
तेरा हर लफ़्ज़ तो पैकान हुआ जाता है
हिज्र की रात तो करवट में गुज़र जाती है
और दिन भी बहुत आसान हुआ जाता है
सारा ग़म मेरी ही क़िस्मत में लिखा है 'सैफ़ी'
दिल मिरा 'मीर' का दीवान हुआ जाता है
ग़ज़ल
शहर-ए-दिल फिर मिरा वीरान हुआ जाता है
मुनीर सैफ़ी

