शाइ'री रूह में तहलील नहीं हो पाती
हम से जज़्बात की तश्कील नहीं हो पाती
हम मुलाज़िम हैं मगर थोड़ी अना रखते हैं
हम से हर हुक्म की तामील नहीं हो पाती
आसमाँ छीन लिया करता है सारा पानी
आँख भरती है मगर झील नहीं हो पाती
शाम तक टूट के हर रोज़ बिखर जाता हूँ
यास उम्मीद में तब्दील नहीं हो पाती
रात-भर नींद के सहरा में भटकता हूँ मगर
सुब्ह तक ख़्वाब की तकमील नहीं हो पाती
ग़ज़ल
शाइ'री रूह में तहलील नहीं हो पाती
शकील आज़मी

