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सफ़र में हैं तो हमें याद बाम-ओ-दर की है | शाही शायरी
safar mein hain to hamein yaad baam-o-dar ki hai

ग़ज़ल

सफ़र में हैं तो हमें याद बाम-ओ-दर की है

इसहाक़ अतहर सिद्दीक़ी

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सफ़र में हैं तो हमें याद बाम-ओ-दर की है
ठहर गए हैं तो फिर आरज़ू सफ़र की है

सुकूँ से बैठने वालो ये तुम ने सोचा भी
यहाँ ये छाँव है लेकिन ये किस शजर की है

मिरे लिए मिरी हिजरत ही अज्र क्या कम है
मैं चल रहा हूँ कि हर राह मेरे घर की है

हमें भी है तो ख़बर धूप छाँव की 'अतहर'
कि हम ने भी तो कोई ज़िंदगी बसर की है