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सफ़र के तजरबों में गर्द-ए-पा भी आ ही जाती है | शाही शायरी
safar ke tajrabon mein gard-e-pa bhi aa hi jati hai

ग़ज़ल

सफ़र के तजरबों में गर्द-ए-पा भी आ ही जाती है

सय्यद अमीन अशरफ़

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सफ़र के तजरबों में गर्द-ए-पा भी आ ही जाती है
मगर उस पेच-ओ-ख़म से कुछ जिला भी आ ही जाती है

जो चलता हूँ फ़लक से ख़ूँ के फ़व्वारे बरसते हैं
जो रुकता हूँ समूम-ए-फ़ित्ना-ज़ा भी आ ही जाती है

ख़िरद की साँस भी रुक जाती है तीरा-ख़याली से
तह-ए-एहसास नादीदा बला भी आ ही जाती है

जो पौदे सहन में खिलते हैं उन को धूप लगती है
दरख़्तों से तर-ओ-ताज़ा हवा भी आ ही जाती है

हरे रह जाएँगे जाँ-दार पत्ते ज़र्द मौसम में
ख़िज़ाँ-बख़्ती में जीने की अदा भी आ ही जाती है

उन्हीं से क़र्या-ए-जाँ में वुफ़ूर-ए-दर्द होता है
उन्हीं नज़रों में तासीर-ए-शिफ़ा भी आ ही जाती है