सारे चमन को दश्त में तब्दील कर गए
बे-दर्द थे जो ऐन जवानी में मर गए
मल्बूस-ए-अहल-ए-होश का मेआ'र देख कर
दीवाने बे-लिबास दरख़्तों से डर गए
शायद उदासियों पे तरस आ गया मिरी
कल रात शहर-ए-जाँ में फ़रिश्ते उतर गए
सुनते हैं उन पे नूर बरसता है आज तक
जिन वादियों से हो के तिरे ख़ुश-नज़र गए
हम सर-फिरे भी ख़ूब थे ऐ 'दिल' कि इश्क़ में
नामूस-ओ-नंग-ओ-नाम भी क़ुर्बान कर गए
ग़ज़ल
सारे चमन को दश्त में तब्दील कर गए
दिल अय्यूबी

