EN اردو
सारे आलम में नूर है तेरा | शाही शायरी
sare aalam mein nur hai tera

ग़ज़ल

सारे आलम में नूर है तेरा

मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम

;

सारे आलम में नूर है तेरा
हर जगह पर ज़ुहूर है तेरा

शर्क़ से ग़र्ब क़ाफ़ से ता-क़ाफ़
तज़्किरा दूर दूर है तेरा

दिल-ए-आशिक़ को क्यूँ जलाता है
ये भी क्या कोह-ए-तूर है तेरा

मैं कहाँ और तेरा नाम कहाँ
सब करम का वफ़ूर है तेरा

शब-ए-फ़ुर्क़त को क्यूँ दराज़ किया
क्या ये रोज़-ए-नुशूर है तेरा

उस सितमगर का क्या करें शिकवा
ओ रे दिल सब क़ुसूर है तेरा

रहम कर आसमाँ पे ऐ बारी
बंदा-ए-पुर-क़सूर है तेरा

इस को कहते हैं 'अंजुम'-ए-आसी
नाम रब्ब-ए-ग़फ़ूर है तेरा