सारे आलम में नूर है तेरा
हर जगह पर ज़ुहूर है तेरा
शर्क़ से ग़र्ब क़ाफ़ से ता-क़ाफ़
तज़्किरा दूर दूर है तेरा
दिल-ए-आशिक़ को क्यूँ जलाता है
ये भी क्या कोह-ए-तूर है तेरा
मैं कहाँ और तेरा नाम कहाँ
सब करम का वफ़ूर है तेरा
शब-ए-फ़ुर्क़त को क्यूँ दराज़ किया
क्या ये रोज़-ए-नुशूर है तेरा
उस सितमगर का क्या करें शिकवा
ओ रे दिल सब क़ुसूर है तेरा
रहम कर आसमाँ पे ऐ बारी
बंदा-ए-पुर-क़सूर है तेरा
इस को कहते हैं 'अंजुम'-ए-आसी
नाम रब्ब-ए-ग़फ़ूर है तेरा
ग़ज़ल
सारे आलम में नूर है तेरा
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम

