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साँस लेना भी बार होता है | शाही शायरी
sans lena bhi bar hota hai

ग़ज़ल

साँस लेना भी बार होता है

आजिज़ मातवी

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साँस लेना भी बार होता है
जब तिरा इंतिज़ार होता है

आता है जब बहार का मौसम
जब जुनूँ उस्तुवार होता है

ज़िक्र क्या दामन-ओ-गरेबाँ का
पैरहन तार तार होता है

आप रोने से मनअ' करते हैं
रोने पर इख़्तियार होता है

है हक़ीक़त यही कि हर चेहरा
दिल का आईना-दार होता है

ऐ मिरे दिल सुकूँ सुकूँ है मगर
इंतिशार इंतिशार होता है

रास आती नहीं ख़ुशी उस को
जिस को ग़म नागवार होता है

सुन के 'आजिज़' वो सर-गुज़श्त मिरी
जाने क्यूँ अश्क-बार होता है