साँस लेना भी बार होता है
जब तिरा इंतिज़ार होता है
आता है जब बहार का मौसम
जब जुनूँ उस्तुवार होता है
ज़िक्र क्या दामन-ओ-गरेबाँ का
पैरहन तार तार होता है
आप रोने से मनअ' करते हैं
रोने पर इख़्तियार होता है
है हक़ीक़त यही कि हर चेहरा
दिल का आईना-दार होता है
ऐ मिरे दिल सुकूँ सुकूँ है मगर
इंतिशार इंतिशार होता है
रास आती नहीं ख़ुशी उस को
जिस को ग़म नागवार होता है
सुन के 'आजिज़' वो सर-गुज़श्त मिरी
जाने क्यूँ अश्क-बार होता है
ग़ज़ल
साँस लेना भी बार होता है
आजिज़ मातवी

