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सानेहा हो के रहा चश्म का मुरझा जाना | शाही शायरी
saneha ho ke raha chashm ka murjha jaana

ग़ज़ल

सानेहा हो के रहा चश्म का मुरझा जाना

शाहिदा हसन

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सानेहा हो के रहा चश्म का मुरझा जाना
ख़्वाब लगता है तिरा ख़्वाब में भी आ जाना

आँख ता-देर रही मौजा-ए-ग़म-नाक में तर
हसन का खेल था आईने को चमका जाना

तू सर-ए-बाम हवा बन के गुज़रता क्यूँ है
मेरे मल्बूस की आदत नहीं लहरा जाना

दश्त के लब पे है इस क़तरा-ए-नैसाँ का मज़ा
तू कहाँ जान सका मैं ने तुझे क्या जाना

तुख़्म बोता है कोई हाथ मिरी मिट्टी में
मुझ को आसाँ है बहुत छाँव का फैला जाना