रोके कुछ देर ग़ुबार आँख का धो लें हम भी
अपने भी दिल को ज़रा आज टटोलें हम भी
नाम ले कर कभी हम को भी पुकारे कोई
अपना दरवाज़ा किसी रोज़ तो खोलें हम भी
लफ़्ज़-ओ-मा'नी भी उभरने लगे सन्नाटे से
दर-ओ-दीवार जो बोले हैं तो बोलें हम भी
जी में आता है कभी उन का तसव्वुर ले कर
कोई जाता हो कहीं साथ में हो लें हम भी
ग़ज़ल
रोके कुछ देर ग़ुबार आँख का धो लें हम भी
कर्रार नूरी

