EN اردو
रंग यहाँ बहुत मगर रंग से काम भी नहीं | शाही शायरी
rang yahan bahut magar rang se kaam bhi nahin

ग़ज़ल

रंग यहाँ बहुत मगर रंग से काम भी नहीं

नुशूर वाहिदी

;

रंग यहाँ बहुत मगर रंग से काम भी नहीं
तेरी ये बज़्म-ए-आब-ओ-गिल दिल का मक़ाम भी नहीं

बस कि कहीं न जाग उठें सोई हुई क़यामतें
ये तो ख़िराम-ए-हश्र है हश्र-ख़िराम भी नहीं

मेरी नमाज़-ए-कैफ़ में सज्दा कहाँ रुकूअ क्या
साक़ी-ए-मस्त की क़सम होश-ए-इमाम भी नहीं

हुस्न तमाम गुफ़्तुगू इश्क़ तमाम ख़ामुशी
रफ़-ए-शुकूक भी नहीं क़त-ए-कलाम भी नहीं

मय से अगर गुरेज़ है सज्दा तो ख़ुम को कीजिए
बादा हराम हो तो हो सज्दा हराम भी नहीं