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पूछो न कुछ कटे है अब औक़ात किस तरह | शाही शायरी
puchho na kuchh kaTe hai ab auqat kis tarah

ग़ज़ल

पूछो न कुछ कटे है अब औक़ात किस तरह

मारूफ़ देहलवी

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पूछो न कुछ कटे है अब औक़ात किस तरह
है ये ही ग़म कि आएँगे वो हात किस तरह

'मारूफ़' से ये मैं ने जो पूछा कि इन दिनों
बतला तिरे गुज़रते है औक़ात किस तरह

कहने लगा कि रोते गुज़रता है मुझ को दिन
फिर मैं कहा कि दिन तो हुआ रात किस तरह

बोला कि रात वक़्त-ए-मुलाक़ात-ए-यार है
पूछा जो मैं कि शक्ल-ए-मुलाक़ात किस तरह

बोला कि हम को एक मुनाजात याद है
मैं ने कहा सुनीं वो मुनाजात किस तरह

बे-इख़्तियार रो के कहा दिल लगा कहीं
कहने की बात है ये कहूँ बात किस तरह