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पलकों पे कुछ चराग़ फ़रोज़ाँ हुए तो हैं | शाही शायरी
palkon pe kuchh charagh farozan hue to hain

ग़ज़ल

पलकों पे कुछ चराग़ फ़रोज़ाँ हुए तो हैं

मुमताज़ मीरज़ा

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पलकों पे कुछ चराग़ फ़रोज़ाँ हुए तो हैं
इस ज़िंदगी के मरहले आसाँ हुए तो हैं

मेरी जबीं ने जिन को नवाज़ा था कल तलक
वो ज़र्रे आज मेहर-ए-दरख़्शाँ हुए तो हैं

नादिम भी होंगे अपनी जफ़ाओं पे एक दिन
वो कम-निगाहियों पे पशीमाँ हुए तो हैं

शम-ए-वफ़ा जलाते हैं ज़ुल्मत-कदों में जो
वो लोग इस जहाँ में परेशाँ हुए तो हैं

किस मौज-ए-ख़ूँ से गुज़रे हैं 'मुमताज़' क्या कहें
कहने को आज हम भी ग़ज़ल-ख़्वाँ हुए तो हैं