निय्यत हो अगर नेक तो देता है ख़ुदा भी
करते हैं अमल लोग तो मिलता है सिला भी
बातिन की हरारत से फुंके जाते हैं तन-मन
पुर्वाई भी चलती है बरसती है घटा भी
छू कर नहीं गुज़री है तिरी ज़ुल्फ़-ए-मुअत्तर
इस बार तो महरूम चली आई सबा भी
इक तुम हो कि बिछड़े तो बिछड़ ही गए हम से
मिलते हैं बहुत लोग तो होते हैं जुदा भी
आदाब-ए-मोहब्बत थे कि दामन नहीं छोड़ा
तुम दूर न थे दूर न थे बंद-ए-क़बा भी
किस यास के आलम में हों क्या जानिए 'अतहर'
मुद्दत हुई आई नहीं होंटों पे दुआ भी
ग़ज़ल
निय्यत हो अगर नेक तो देता है ख़ुदा भी
अतहर शकील

