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निय्यत हो अगर नेक तो देता है ख़ुदा भी | शाही शायरी
niyyat ho agar nek to deta hai KHuda bhi

ग़ज़ल

निय्यत हो अगर नेक तो देता है ख़ुदा भी

अतहर शकील

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निय्यत हो अगर नेक तो देता है ख़ुदा भी
करते हैं अमल लोग तो मिलता है सिला भी

बातिन की हरारत से फुंके जाते हैं तन-मन
पुर्वाई भी चलती है बरसती है घटा भी

छू कर नहीं गुज़री है तिरी ज़ुल्फ़-ए-मुअत्तर
इस बार तो महरूम चली आई सबा भी

इक तुम हो कि बिछड़े तो बिछड़ ही गए हम से
मिलते हैं बहुत लोग तो होते हैं जुदा भी

आदाब-ए-मोहब्बत थे कि दामन नहीं छोड़ा
तुम दूर न थे दूर न थे बंद-ए-क़बा भी

किस यास के आलम में हों क्या जानिए 'अतहर'
मुद्दत हुई आई नहीं होंटों पे दुआ भी