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निगाह-ए-यार सूँ हासिल है मुझ कूँ मय-नोशी | शाही शायरी
nigah-e-yar sun hasil hai mujh kun mai-noshi

ग़ज़ल

निगाह-ए-यार सूँ हासिल है मुझ कूँ मय-नोशी

दाऊद औरंगाबादी

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निगाह-ए-यार सूँ हासिल है मुझ कूँ मय-नोशी
लब-ए-ख़मोश ने बख़्शा है उस के ख़ामोशी

बजा है गर करे आशिक़ कूँ एक दौर में मस्त
है जाम-ए-चश्म-ए-सनम में शराब-ए-बे-होशी

किया है शोख़ ने बर में क़बा-ए-नाफ़रमाँ
उदूल क्यूँ न करे वादा-ए-हम-आग़ोशी

सजन के नावक-ए-मिज़्गाँ के दिल में हैबत रख
किया है मैं ने ये दरिया मने ज़िरह-पोशी

किया नहीं हूँ रक़म ख़त मैं इस सबब 'दाऊद'
मैं नामा-बर सूँ कहा हूँ कि राज़ है गोशी