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नसीब-ए-चश्म में लिक्खा है गर पानी नहीं होना | शाही शायरी
nasib-e-chashm mein likkha hai gar pani nahin hona

ग़ज़ल

नसीब-ए-चश्म में लिक्खा है गर पानी नहीं होना

शहराम सर्मदी

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नसीब-ए-चश्म में लिक्खा है गर पानी नहीं होना
तो क्या ये तय है अब रंज-ए-पशेमानी नहीं होना

सकूँ से जा लगेगी दिल की कश्ती अपने साहिल से
कि इस बरसात में दरिया को तूफ़ानी नहीं होना

सभी कुछ तय-शुदा मा'मूली जैसा होने वाला है
किसी भी वाक़िए को वज्ह-ए-हैरानी नहीं होना

जुनूँ में मुमकिना हद तक रहेगा होश भी शामिल
मिरी जाँ बे-ज़रूरत कार-ए-नादानी नहीं होना

हमीं उन ख़ुश-नसीबों में से हैं, जिन के नसीबों में
ख़ुदा ने साफ़ लिक्खा है ''परेशानी नहीं होना''