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नजात के लिए रोज़-ए-सियाह माँगती है | शाही शायरी
najat ke liye roz-e-siyah mangti hai

ग़ज़ल

नजात के लिए रोज़-ए-सियाह माँगती है

मोहम्मद इज़हारुल हक़

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नजात के लिए रोज़-ए-सियाह माँगती है
ज़मीन अहल-ए-ज़मीं से पनाह माँगती है

भरा न अतलस-ओ-मरमर से पेट ख़िल्क़त का
ये बद-निहाद अब आब-ओ-गियाह माँगती है

रियाज़तों से फ़रिश्ता-सिफ़त तो हो न सकी
मोहब्बत आई है ताब-ए-गुनाह माँगती है

वो रंग-ए-कूचा-ओ-बाज़ार है कि अब बस्ती
घरों से दूर अलग क़त्ल-गाह माँगती है

रगों में दौड़ता फिरता है इज्ज़ सदियों का
रईयत आज भी इक बादशाह माँगती है