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नफ़स नफ़स इज़्तिराब में था | शाही शायरी
nafas nafas iztirab mein tha

ग़ज़ल

नफ़स नफ़स इज़्तिराब में था

सुल्तान अख़्तर

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नफ़स नफ़स इज़्तिराब में था
मैं हल्क़ा-ए-सद-इताब में था

सभी नज़ारे नज़र में गुम थे
कि सारा मंज़र हिजाब में था

पढ़ा तो कुछ भी न हाथ आया
लिखा बहुत कुछ किताब में था

लहू की आहट पे चौंक उट्ठा
वो मुद्दतों जैसे ख़्वाब में था

दिलों में रौशन नई कहानी
पुराना क़िस्सा किताब में था

बस इक हुनर तह-ब-तह मुनव्वर
बस इक सुख़न इंतिख़ाब में था

मैं उस की ख़ुश्बू में गुम था 'अख़्तर'
वो मेरे ग़म के हिसाब में था