नए मकाँ में अक़ीदे की कोई जा ही नहीं
ख़ुदा तो है प कहीं बंदा-ए-ख़ुदा ही नहीं
भरोसा यूँ तो बहुत था मगर दुआ के लिए
जो हाथ हम ने उठाया तो वो उठा ही नहीं
हर एक शख़्स यहाँ अपने-आप में गुम है
किसी से हाथ मिलाने का फ़ाएदा ही नहीं
लहू-लुहान है जो भी उधर से आया है
मगर ये मैं कि जो उस राह तक गया ही नहीं
दयार-ए-ख़्वाब है आओ यहीं क़याम करें
यहाँ से यूँ भी निकलने का रास्ता ही नहीं
ग़ज़ल
नए मकाँ में अक़ीदे की कोई जा ही नहीं
मज़हर इमाम

