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नाज़ का मारा हुआ हूँ मैं अदा की सौगंद | शाही शायरी
naz ka mara hua hun main ada ki saugand

ग़ज़ल

नाज़ का मारा हुआ हूँ मैं अदा की सौगंद

रज़ा अज़ीमाबादी

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नाज़ का मारा हुआ हूँ मैं अदा की सौगंद
कुश्ता-ए-जौर-ओ-जफ़ा हूँ मैं वफ़ा की सौगंद

ख़्वाह काफ़िर मुझे कह ख़्वाह मुसलमान ऐ शैख़
बुत के हाथों में बिकाया हूँ ख़ुदा की सौगंद

कुछ ख़बर राह-ए-फ़ना की भी रखे है हम से
कह दे ऐ ख़िज़्र तुझे आब-ए-बक़ा की सौगंद

यार से ख़्वारी-ओ-रुस्वाई हमें बेहतर है
ग़ैर की इज़्ज़त-ओ-हुर्मत से वफ़ा की सौगंद

शम्अ की रौशनी सर कटने से होती है दो-चंद
दर्द ही से मुझे हासिल है दवा की सौगंद

उस की गर जान से मतलब नहीं तुझ को ऐ मियाँ
छूटे क्यूँ खाता है हर दम तू 'रज़ा' की सौगंद