नाला-ए-दिल की तो कोताही नहीं
पर असर कुछ उस को होता ही नहीं
कितना वो क़ातिल है बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर
तेग़-ए-ख़ूँ-आलूदा धोता ही नहीं
उस गली में जिस तरह रोता हूँ मैं
उस तरह तो कोई रोता ही नहीं
ख़ार-ज़ार-ए-इश्क़ को क्या हो गया
पाँव में काँटे चुभोता ही नहीं
तर्क की लज़्ज़त से वाक़िफ़ कौन हैं
गर न होता जान खोता ही नहीं
जानता गर दिल है मज़रा यास का
तुख़्म-ए-उम्मीद इस में बोता ही नहीं
जों सुख़न आता है सिल्क-ए-नज़्म में
यूँ कोई मोती पिरोता ही नहीं
ख़्वाब में 'जोशिश' वो आए किस तरह
आशिक़-ए-बे-ताब सोता ही नहीं
ग़ज़ल
नाला-ए-दिल की तो कोताही नहीं
जोशिश अज़ीमाबादी

