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न सुनी पर न सुनी उस ने दिल-ए-ज़ार की अर्ज़ | शाही शायरी
na suni par na suni usne dil-e-zar ki arz

ग़ज़ल

न सुनी पर न सुनी उस ने दिल-ए-ज़ार की अर्ज़

तनवीर देहलवी

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न सुनी पर न सुनी उस ने दिल-ए-ज़ार की अर्ज़
कौन सुनता है भला ऐसे गुनहगार की अर्ज़

चलो आहिस्ता कि होती है क़यामत बरपा
फ़ित्ना-ए-हश्र ने ये उस से कई बार की अर्ज़

जुम्बिश-ए-लब है दम-ए-नज़अ' ये कुछ कहता है
सुन तो लो अपने ज़रा माइल-ए-गुफ़्तार की अर्ज़

ज़िक्र-ए-अग़्यार से छिड़का किए ज़ख़्मों पे नमक
दम-ए-कुश्तन न सुनी कुश्ता-ए-तलवार की अर्ज़

मद्ह-ख़्वाँ आल-ए-एबा का मैं रहूँ ऐ 'तनवीर'
है ये ख़िदमत में जनाब-ए-शह-ए-अबरार की अर्ज़