न माना मेरा कहना दिल गया क्यूँ दाद-ख़्वाही को
सज़ा देते हैं वाँ मुजरिम बना कर बे-गुनाही को
हमारी बे-कसी ने छान डाला है जहाँ सारा
सिवा तेरे ठिकाना ही नहीं है बे-पनाही को
क़यामत में वो मुझ को देख कर कहते हैं ग़ैरों से
ख़ुदा की शान है आशिक़ चले हैं दाद-ख़्वाही को
उड़ाई ख़ाक उस की ख़ूब जा कर कोह-ओ-सहरा में
दिल-ए-वहशी ने क्या उल्टे दिए चक्कर तबाही को
उजड़ जाएगा जिस दिन कारख़ाना बादा-ख़्वारों का
बहुत रोएगा साक़ी कश्ती-ए-मय की तबाही को
बुरा हो रश्क का रहबर समझ कर दिल से जो पूछा
अदम का रास्ता बतला दिया गुम-गश्ता-राही को
ग़ज़ल
न माना मेरा कहना दिल गया क्यूँ दाद-ख़्वाही को
आशिक़ अकबराबादी

