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न जान कर गुल-ए-बाज़ी बहुत उछाल के फेंक | शाही शायरी
na jaan kar gul-e-bazi bahut uchhaal ke phenk

ग़ज़ल

न जान कर गुल-ए-बाज़ी बहुत उछाल के फेंक

शाद लखनवी

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न जान कर गुल-ए-बाज़ी बहुत उछाल के फेंक
ये दिल है टूट न जाए ज़रा सँभाल के फेंक

सितम है यूँ दिल-ए-पुर-ख़ूँ दिया उछाल के फेंक
कि जिस तरह कोई दे क़हक़हे गुलाल के फेंक

गहन से चाँद निकलता है किस तरह देखें
नक़ाब को रुख़-ए-रौशन से खोल-खाल के फेंक

ख़ता करे न कहीं दिल पे ऐ कमाँ-अबरू
जो तीर फेंक यहाँ उस को देख-भाल के फेंक

वो मय पिला हमें साक़ी कि रिंद मुफ़लिस हैं
सुबू-ओ-जाम से तलछट भी जो खँगाल के फेंक

जो दर्द-ए-दिल से तड़पता हूँ ज़ब्त कहता है
जिगर को सीने से पहलू से दिल निकाल के फेंक

तलब किया है सफ़ेद उस ने फ़र्श-ए-पा-अंदाज़
मह-ए-दो-हफ़्ता ने दी चाँदनी उजाल के फेंक

सिपर हुई जो मिरी क़ब्र की सियह-कारी
यद-ए-करम ने दिए चार फूल ढाल के फेंक

वो बुलबुला दिल-ए-नाज़ुक है ऐ यम-ए-ख़ूबी
हबाब से भी सुबुक-तर इसे सँभाल के फेंक

सुने से जिस के उड़ें होश कब्क-ओ-बुलबुल के
वो लिख के शे'र अब ऐ 'शाद' बोल-चाल के फेंक