न होने का गुमाँ रक्खा हुआ है
कि होने में ज़ियाँ रक्खा हुआ है
ज़मीं के जिस्म पर क़ब्रें नहीं हैं
ख़याल-ए-रफ़्तगाँ रक्खा हुआ है
सर-ए-मिज़्गाँ मिरे आँसू नहीं हैं
सुलूक-ए-दोस्ताँ रक्खा हुआ है
यहाँ जो इक चराग़-ए-ज़िंदगी था
न जाने अब कहाँ रक्खा हुआ है
ये दुनिया इक तिलिस्म-ए-आब-ओ-गिल है
यहाँ सब राएगाँ रक्खा हुआ है
ग़ज़ल
न होने का गुमाँ रक्खा हुआ है
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर

