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न हम-नवा मिरे ज़ौक़-ए-ख़िराम का निकला | शाही शायरी
na ham-nawa mere zauq-e-KHiram ka nikla

ग़ज़ल

न हम-नवा मिरे ज़ौक़-ए-ख़िराम का निकला

मज़हर इमाम

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न हम-नवा मिरे ज़ौक़-ए-ख़िराम का निकला
ये रास्ता भी उसी नर्म-गाम का निकला

नए गुलों की सदा-ए-शगुफ़्त तेज़ हुई
हवा के लम्स से रिश्ता कलाम का निकला

मुसव्विरी न सही काम आई बे-हुनरी
कोई बहाना तो उन से सलाम का निकला

तलाश-ए-रिज़्क़ में निकले थे महर-ए-सुब्ह लिए
अक़ब से पहला सितारा भी शाम का निकला

यहाँ भी धूप चली आई बे-ख़याली की
ये साएबान-ए-तसव्वुर न काम का निकला

मुसाहिबों की तरह हर क़दम पे ख़ार मिले
मिरा सफ़र तो बड़े एहतिमाम का निकला

वही शजर वही पत्ते वही हवा वही आग
कलाम-ए-नौ भी मिरा रंग-ए-आम का निकला