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न हम महव-ए-ख़याल अबरू-ए-ख़म-दार सोते हैं | शाही शायरी
na hum mahw-e-KHayal abru-e-KHam-dar sote hain

ग़ज़ल

न हम महव-ए-ख़याल अबरू-ए-ख़म-दार सोते हैं

मारूफ़ देहलवी

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न हम महव-ए-ख़याल अबरू-ए-ख़म-दार सोते हैं
सिपाही हैं ज़ि-बस बाँधे हुए तलवार सोते हैं

तुम्हारा सोते सोते चौंक पड़ना खब गया दिल में
कि अक्सर ख़ुद-बख़ुद हो हो के हम बेदार सोते हैं

इलाही हम को है किस का ख़याल-ए-ख़्वाब-ओ-बेदारी
जो लाखों हार उठते हैं हज़ारों यार सोते हैं

निगाह-ए-मस्त-ए-साक़ी में है क्या दारा-ए-बेहोशी
कि साग़र लग रहा है मुँह से और मय-ख़्वार सोते हैं

न कर वसवास दिल में चल वहाँ 'मारूफ़' बे-खटके
कि दरबान ऊँघता है और चौकीदार सोते हैं