न हम महव-ए-ख़याल अबरू-ए-ख़म-दार सोते हैं
सिपाही हैं ज़ि-बस बाँधे हुए तलवार सोते हैं
तुम्हारा सोते सोते चौंक पड़ना खब गया दिल में
कि अक्सर ख़ुद-बख़ुद हो हो के हम बेदार सोते हैं
इलाही हम को है किस का ख़याल-ए-ख़्वाब-ओ-बेदारी
जो लाखों हार उठते हैं हज़ारों यार सोते हैं
निगाह-ए-मस्त-ए-साक़ी में है क्या दारा-ए-बेहोशी
कि साग़र लग रहा है मुँह से और मय-ख़्वार सोते हैं
न कर वसवास दिल में चल वहाँ 'मारूफ़' बे-खटके
कि दरबान ऊँघता है और चौकीदार सोते हैं
ग़ज़ल
न हम महव-ए-ख़याल अबरू-ए-ख़म-दार सोते हैं
मारूफ़ देहलवी

