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न फुरात-ओ-दजला पे नाज़ कर न फ़रेब-ए-गंग-ओ-जमन में आ | शाही शायरी
na furaat-o-dajla pe naz kar na fareb-e-gang-o-jaman mein aa

ग़ज़ल

न फुरात-ओ-दजला पे नाज़ कर न फ़रेब-ए-गंग-ओ-जमन में आ

अर्श मलसियानी

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न फुरात-ओ-दजला पे नाज़ कर न फ़रेब-ए-गंग-ओ-जमन में आ
ये जहान सब है तिरा वतन तू किधर है अपने वतन में आ

तू है रंग-ए-नर्गिस-ओ-नस्तरन है तुझी से रौनक़-ए-अंजुमन
तिरे मुंतज़िर हैं गुल-ओ-समन तो बहार बन के चमन में आ

तुझे लाख लोग हसीं कहें तुझ लाख दुर्र-ए-समीं कहें
तिरी क़द्र होगी फ़क़त यहीं तो हरीम-ए-दिल के अदन में आ

जो ख़याल-ए-ख़ुल्द में हो मगन मय-ओ-अंगबीं में हो जिस का मन
जो वतन में रह के हो बे-वतन उसे क्या कहूँ कि वतन में आ

ये बहार-ए-बाग़ ये महफ़िलें तिरी ख़ल्वतों पे निसार हों
तुझे काम ग़ुंचा-ओ-गुल से क्या तू चमन को छोड़ के बन में आ

रह-ओ-रस्म-ए-इश्क़ पे रख नज़र हो जहान-ए-नौ का पयाम्बर
न तो अहद-ए-रफ़्ता को याद कर न फ़रेब-ए-चर्ख़-ए-कुहन में आ

ये खुला न हम पे कि तू कहाँ मय-ए-शे'र पी के निकल गया
तुझे याद करते हैं 'अर्श' सब कभी फिर भी बज़्म-ए-सुख़न में आ