मुतमइन हो के मरने का सामान कर
ज़िंदगी ऐ ख़ुदा मुझ पे आसान कर
सिर्फ़ रस्मी तआ'रुफ़ ही काफ़ी नहीं
मेरे नज़दीक आ मेरी पहचान कर
रस्म है सज्दा-रेज़ी तो कुछ भी नहीं
क़ल्ब को पहले अपने मुसलमान कर
अब्र की ओट में चाँद कब का छुपा
अब न चेहरे पे ज़ुल्फ़ें परेशान कर
मौत तो आएगी बे-तलब आएगी
ज़िंदगी है तो जीने का अरमान कर
उस से मिल कर मैं कहता तो कैसे 'शकील'
मुझ को घर अपने इक रोज़ मेहमान कर
ग़ज़ल
मुतमइन हो के मरने का सामान कर
अतहर शकील

