मुस्तक़बिल रौशन-तर कहिए
लेकिन आँख मिला कर कहिए
बर्बादी को मंज़र कहिए
कहिए सोच समझ कर कहिए
समझाया था देख के चलिए
कैसी खाई ठोकर कहिए
दम घुटने की बात अलग है
तौक़-ए-गुलू को ज़ेवर कहिए
आँसू हैं क़ानून से बाहर
ग़म की बातें हँस कर कहिए
आईना दिखलाना होगा
सच्ची बातें मुँह पर कहिए
शैख़ी की भी हद होती है
कब तक बेहतर बेहतर कहिए
ग़ज़ल
मुस्तक़बिल रौशन-तर कहिए
शाद आरफ़ी

