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मुरत्तब हो के इक महशर ग़ुबार-ए-दिल से निकलेगा | शाही शायरी
murattab ho ke ek mahshar ghubar-e-dil se niklega

ग़ज़ल

मुरत्तब हो के इक महशर ग़ुबार-ए-दिल से निकलेगा

सीमाब अकबराबादी

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मुरत्तब हो के इक महशर ग़ुबार-ए-दिल से निकलेगा
नया इक कारवाँ गर्द-ए-रह-ए-मंज़िल से निकलेगा

हमारे मुँह से और शिकवा तुम्हारा हो नहीं सकता
तुम्हारा नाम भी शायद बड़ी मुश्किल से निकलेगा

न होगा गोशा-ए-दामन मिरा वाबस्ता-ए-मंज़िल
न जब तक हाथ तेरा पर्दा-ए-मंज़िल से निकलेगा

मिरी आँखें हैं बज़्म-ए-रंग-ओ-बू में मुंतज़िर तेरी
नहीं मालूम तू कब तक हिजाब-ए-दिल से निकलेगा

मैं अपने दिल को यूँ पेश-ए-नज़र 'सीमाब' रखता हूँ
कि मेरा चाँद जब निकला इसी मंज़िल से निकलेगा