हर-दम तरफ़ है वैसे मिज़ाज करख़्त का
टुकड़ा मिरा जिगर है कहो संग सख़्त का
सब्ज़ान इन रू की जहाँ जल्वा-गाह थी
अब देखिए तो वाँ नहीं साया दरख़्त का
जों बर्ग-हा-ए-लाला परेशान हो गया
मज़कूर किया है अब जिगर लख़्त लख़्त का
दिल्ली में आज भीक भी मिलती नहीं उन्हें
था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताज-ओ-तख़्त का
ख़ाक-ए-सियह से में जो बराबर हुआ हूँ 'मीर'
साया पड़ा है मुझ पे कसो तीरा-बख़्त का
ग़ज़ल
हर-दम तरफ़ है वैसे मिज़ाज करख़्त का
मीर तक़ी मीर

