इधर से अब्र उठ कर जो गया है
हमारी ख़ाक पर भी रो गया है
मसाइब और थे पर दिल का जाना
अजब इक सानेहा सा हो गया है
मुक़ामिर-ख़ाना-ए-आफ़ाक़ वो है
कि जो आया है याँ कुछ खो गया है
कुछ आओ ज़ुल्फ़ के कूचे में दरपेश
मिज़ाज अपना उधर अब तो गया है
सिरहाने 'मीर' के कोई न बोलो
अभी टुक रोते रोते सो गया है
ग़ज़ल
इधर से अब्र उठ कर जो गया है
मीर तक़ी मीर

