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जहाँ अब ख़ार ज़ारीं हो गई हैं | शाही शायरी
jahan ab Khaar zarin ho gai hain

ग़ज़ल

जहाँ अब ख़ार ज़ारीं हो गई हैं

मीर तक़ी मीर

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जहाँ अब ख़ार ज़ारीं हो गई हैं
यहीं आगे बहारें हो गई हैं

जुनूँ में ख़ुश्क हो रग-हा-ए-गर्दन
गरेबाँ की सी तारें हो गई हैं

सुना जाता है शहर-ए-इश्क़ के गर्द
मज़ारें ही मज़ारें हो गई हैं

इसी दरया-ए-ख़ूबी का है ये शौक़
कि मौजें सब कनारें हो गई हैं

उन्हीं गलियों में जब रोते थे हम 'मीर'
कई दरिया की धारें हो गई हैं