मेहरबानी भी है इताब भी है
कुछ तसल्ली कुछ इज़्तिराब भी है
है तो अग़्यार से ख़िताब मगर
मेरी हर बात का जवाब भी है
वाँ बराबर है ख़ल्वत-ओ-जल्वत
उस की बे-पर्दगी हिजाब भी है
हो क़नाअत तो है जहाँ दरिया
हिर्स ग़ालिब हो तो सराब भी है
वो तख़बतुर कहाँ तपाक कहाँ
गर्म-ओ-रौशन तो आफ़्ताब भी है
ग़ज़ल
मेहरबानी भी है इताब भी है
इस्माइल मेरठी

