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मेहरबानी भी है इताब भी है | शाही शायरी
mehrbani bhi hai itab bhi hai

ग़ज़ल

मेहरबानी भी है इताब भी है

इस्माइल मेरठी

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मेहरबानी भी है इताब भी है
कुछ तसल्ली कुछ इज़्तिराब भी है

है तो अग़्यार से ख़िताब मगर
मेरी हर बात का जवाब भी है

वाँ बराबर है ख़ल्वत-ओ-जल्वत
उस की बे-पर्दगी हिजाब भी है

हो क़नाअत तो है जहाँ दरिया
हिर्स ग़ालिब हो तो सराब भी है

वो तख़बतुर कहाँ तपाक कहाँ
गर्म-ओ-रौशन तो आफ़्ताब भी है