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मौजों का अक्स है ख़त-ए-जाम-ए-शराब में | शाही शायरी
maujon ka aks hai KHat-e-jam-e-sharab mein

ग़ज़ल

मौजों का अक्स है ख़त-ए-जाम-ए-शराब में

असग़र गोंडवी

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मौजों का अक्स है ख़त-ए-जाम-ए-शराब में
या ख़ून उछल रहा है रग-ए-माहताब में

वो मौत कि कहते हैं जिस को सुकून सब
वो ऐन ज़िंदगी है जो है इज़्तिराब में

दोज़ख़ भी एक जल्वा-ए-फ़िरदौस-ए-हुस्न है
जो उस से बे-ख़बर है वही है अज़ाब में

उस दिन भी मेरी रूह थी महव-ए-नशात-ए-दीद
मूसा उलझ गए थे सवाल ओ जवाब में

मैं इज़्तिराब-ए-शौक़ कहूँ या जमाल-ए-दोस्त
इक बर्क़ है जो कौंध रही है नक़ाब में