मौजों का अक्स है ख़त-ए-जाम-ए-शराब में
या ख़ून उछल रहा है रग-ए-माहताब में
वो मौत कि कहते हैं जिस को सुकून सब
वो ऐन ज़िंदगी है जो है इज़्तिराब में
दोज़ख़ भी एक जल्वा-ए-फ़िरदौस-ए-हुस्न है
जो उस से बे-ख़बर है वही है अज़ाब में
उस दिन भी मेरी रूह थी महव-ए-नशात-ए-दीद
मूसा उलझ गए थे सवाल ओ जवाब में
मैं इज़्तिराब-ए-शौक़ कहूँ या जमाल-ए-दोस्त
इक बर्क़ है जो कौंध रही है नक़ाब में
ग़ज़ल
मौजों का अक्स है ख़त-ए-जाम-ए-शराब में
असग़र गोंडवी

