मैं तुझे वाह क्या तमाशा है
ज़ेहन में आश्ना तराशा है
हाथ में रखियो तू सँभाले हुए
दिल तो मेरा ये सीशा-बाशा है
तू जो तोले है मेरे मन की चाह
कुछ तिरे हाँ भी तोला-माशा है
क्या कहूँ तेरी काविश-ए-मिज़ा ने
किस तरह से जिगर ख़राशा है
ख़ैर गुज़रे 'असर' तू है बेबाक
और वो शोख़ बे-तहाशा है
ग़ज़ल
मैं तुझे वाह क्या तमाशा है
मीर असर

