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मैं जिन्हें फ़रेब समझूँ तिरी याद-ए-मेहरबाँ के | शाही शायरी
main jinhen fareb samjhun teri yaad-e-mehrban ke

ग़ज़ल

मैं जिन्हें फ़रेब समझूँ तिरी याद-ए-मेहरबाँ के

क़मर जमील

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मैं जिन्हें फ़रेब समझूँ तिरी याद-ए-मेहरबाँ के
वो चराग़ बुझ गए हैं मिरी उम्र-ए-जावेदाँ के

न ये लाला-ज़ार अपने न ये रहगुज़ार अपनी
वही घर ज़मीं के नीचे वही ख़्वाब आसमाँ के

ये पियाला है कि दिल है ये शराब है कि जाँ है
ये दरख़्त हैं कि साए किसी दस्त-ए-मेहरबाँ के

मुझे याद आ रहे हैं वो चराग़ जिन के साए
कभी दोस्तों के चेहरे कभी दाग़ रफ़्तगाँ के