मैं जब भी छूने लगूँ तुम ज़रा परे हो जाओ
ये क्या कि लम्स में आते ही दूसरे हो जाओ
ये कार-ए-इश्क़ मगर हम से कैसे सरज़द हो
अलाव तेज़ है साहब ज़रा परे हो जाओ
तुम्हारी उम्र भी उस आब के हिसाब में है
नहीं कि उस के बरसने से तुम हरे हो जाओ
ये गोशा-गीर तबीअ'त भी एक महबस है
हवा के लम्स में आओ हरे-भरे हो जाओ
कभी तो मतला-ए-दिल से हो इतनी बारिश-ए-अश्क
कि तुम भी खुल के बरसते हुए खरे हो जाओ
ग़ज़ल
मैं जब भी छूने लगूँ तुम ज़रा परे हो जाओ
आफ़ताब इक़बाल शमीम

