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मैं जब भी छूने लगूँ तुम ज़रा परे हो जाओ | शाही शायरी
main jab bhi chhune lagun tum zara pare ho jao

ग़ज़ल

मैं जब भी छूने लगूँ तुम ज़रा परे हो जाओ

आफ़ताब इक़बाल शमीम

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मैं जब भी छूने लगूँ तुम ज़रा परे हो जाओ
ये क्या कि लम्स में आते ही दूसरे हो जाओ

ये कार-ए-इश्क़ मगर हम से कैसे सरज़द हो
अलाव तेज़ है साहब ज़रा परे हो जाओ

तुम्हारी उम्र भी उस आब के हिसाब में है
नहीं कि उस के बरसने से तुम हरे हो जाओ

ये गोशा-गीर तबीअ'त भी एक महबस है
हवा के लम्स में आओ हरे-भरे हो जाओ

कभी तो मतला-ए-दिल से हो इतनी बारिश-ए-अश्क
कि तुम भी खुल के बरसते हुए खरे हो जाओ