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मैं जानता हूँ ख़ुशामद-पसंद कितना है | शाही शायरी
main jaanta hun KHushamad-pasand kitna hai

ग़ज़ल

मैं जानता हूँ ख़ुशामद-पसंद कितना है

शकील आज़मी

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मैं जानता हूँ ख़ुशामद-पसंद कितना है
ये आसमान ज़मीं से बुलंद कितना है

तमाम रस्म उठा ली गई मोहब्बत में
दिलों के बीच मगर क़ैद-ओ-बंद कितना है

जो देखता है वही बोलता है लोगों से
ये आइना भी हक़ीक़त-पसंद कितना है

तमाम रात मिरे साथ जागता है कोई
वो अजनबी है मगर दर्द-मंद कितना है

मैं उस के बारे में अक्सर ये सोचता हूँ 'शकील'
खुला हुआ है वो इतना तो बंद कितना है