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मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा | शाही शायरी
main hawa hun kahan watan mera

ग़ज़ल

मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा

अमीक़ हनफ़ी

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मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा
दश्त मेरा न ये चमन मेरा

मैं कि हर चंद एक ख़ाना-नशीं
अंजुमन अंजुमन सुख़न मेरा

बर्ग-ए-गुल पर चराग़ सा क्या है
छू गया था उसे दहन मेरा

मैं कि टूटा हुआ सितारा हूँ
क्या बिगाड़ेगी अंजुमन मेरा

हर घड़ी इक नया तक़ाज़ा है
दर्द-ए-सर बन गया बदन मेरा