मय-कदे में बैठ कर ईमान की पर्वा न कर
या उसे भी एक दो चुल्लू पिला दीवाना कर
मुस्कुरा दे क़िस्सा-ए-उम्मीद कर दे मुख़्तसर
या बढ़ा ले चल ज़रा सी बात को अफ़्साना कर
ख़ुश-मज़ाक़ी शर्त हो जिस के नज़ारे के लिए
उस गुल-ए-ख़ुद-रू को यारब ज़ीनत-ए-वीराना कर
हादिसा है लेकिन ऐसा ग़ैर-मा'मूली नहीं
शम्अ' पर परवाना जलने दे कोई परवाना कर
ग़ज़ल
मय-कदे में बैठ कर ईमान की पर्वा न कर
हरी चंद अख़्तर

